नमस्कार दोस्तों एक बार फिर से आप सभी का स्वागत है आपके अपने वेबसाइट पर मैं आज अपने ब्लॉग पर कलम के सिपाही के बारे में बताऊंगा जिसे भारत का सबसे बड़ा उपन्यासकार और लेखक भी कहा जाता हैआज मैं उनकी जिंदगी से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण चीजें आप सभी को बताऊंगा तो मेरे Blog को पूरा जरूर पढ़ना।

दोस्तों अगर एक लेखक के शब्द उसके चले जाने के बाद भी सदियों तक लोगो के लिए प्रेरक बनी रहे तो हमें समझ लेना चाहिए की वह एक बोहत बारे साहित्यकार थे ऐसे ही लेखकों की सूची में उपन्यासकार सम्राट मुंशी प्रेमचंद आते हैं उन्होंने लगभग एक दर्जन से भी ज्यादा उपन्यास और २५० भी ज्यादा निबंध लिखें आज भी उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को पढ़ा जाता है आज भी उनके कई बड़े बारे लेखक उनका मुकाबला नहीं केर पाते मानवीय भावनाओं की संपूर्ण और सहज अभिव्यक्ति हमें उनकी कहानियों और उपन्यासों में देखने को मिलता है आम जनता के बिच में उन्होंने इसी अभीव्यक्ति के द्वारा अपनी जगह बनाई

kalam ka sipahi kise kaha jata hai
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दोस्तों कलम का सिपाही साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद्र को कहा जाता है। प्रेमचंद का बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।

मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म 31 जुलाई 1880 के दिन वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था इनकी मृत्यु 8 अक्टूबर 1936 को हुई थी।

मुंशी प्रेमचंद्र की प्रमुख रचनाएं

प्रमुख रचनाएं – प्रेमश्रम, कायाकल्प, प्रेम पच्चीसी, रंगभूमि, निर्मला, मंगलसूत्र, सेवा सदन, गोदान गबन, कर्मभूमि, कफन, मैदानेवफ़ा, सोजे वतन अदि।

Munshi premchand Biography

वह साहित्य को यथार्थ में पिरोने और अपनी अंतिम सांस तक किसानों मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले यशस्वी थे।

उन्होंने अपनी कलम की ताकत से पूरे सोसाइटी को पूरे समाज को एक नई दिशा देने की कोशिश की

दोस्तों समाज में जितने भी बुरी प्रथाएं बुरी नीतियां थी जातिवाद था भेदभाव के खिलाफ इन्होंने लिखा और अपने लेखन से पूरे समाज और सोसाइटी को एक नई दिशा दी जाए उन्होंने ऐसा सोचा और दोस्तों उन्होंने उस समय लिखा जिस समय यह लेखन शैली बिल्कुल भी नहीं लिखी जाती थी

इन्होंने अनेक उपन्यास नाटक कहानियां बाल पुस्तकें और भाषण पत्र आदि की रचनाएं की है।

दोस्तों उनके परिवार की आर्थिक हालत बहुत तंग थी डॉकखाने में मामूली नौकर के तौर पर उनके पिता अजायब राय काम किया करते थे।

प्रेमचंद जब केवल 8 वर्ष के थे तब उनकी मां की मृत्यु हो गई पिता ने दूसरी शादी कर ली ।

सौतेली मां ने प्रेमचंद को कभी वह प्यार नहीं दिया जो एक बालक को मिलना चाहिए

ऊपर से गरीब इतनी कि ना तो उनके पास ढंग के कपड़े थे और ना ही पेट भरने के लिए पर्याप्त भोजन । प्रेमचंद बहुत छोटी उम्र से ही यह उपन्यास पढ़ने लगे थे ।

यहीं से उनके मन में साहित्य के प्रति रुचि पैदा हुई यहीं से उन्होंने साहित्य को मनुष्य के हृदय को स्पर्श करने वाली विधा के रूप में देखना शुरू किया था ।

15 वर्ष की उम्र में उनका विवाह करवा दिया गया प्रेमचंद इसके लिए तैयार नहीं थे ।

आगे पारिवारिक करें और गरीबी की वजह से उनकी पत्नियों ने छोड़कर मायके चली गई कहा जाता है ।

प्रेमचंद  गरीब परिवार चलाने के लिए उन्हें अपना कोट और पुस्तक बेचनी पड़ी थी आगे उनकी दूसरी शादी हुई इसके बाद प्रेमचंद के जीवन  बताया गया हे।

जब उन्हें सरकारी नौकरी मिली तो सरकारी नौकरी पैर रहते हुई उन्होंने लिखना शुरू किया  इस समय सोजे वतन के नाम से उनकी कहानी संग्रह प्रकाशित हुई। यह संग्रह उर्दू भाषा में था और अंत में स्वतंत्रता के समय छोर दी  Gandhi के कहने पे

और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े उन्होंने एक निबंध लिखें मानव समाज की प्रगति में साहित्य के योगदान और लगातार सांप्रदायिकता जमींदारों के शोषण और स्त्रियों के उन्मूलन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय थे ।

उन्होंने अपनी कलम की ताकत से पूरे सोसाइटी को पूरे समाज को एक नई दिशा देने की कोशिश की

दोस्तों समाज में जितने भी बुरी प्रथाएं बुरी नीतियां थी जातिवाद था भेदभाव के खिलाफ इन्होंने लिखा और अपने लेखन से पूरे समाज और सोसाइटी को एक नई दिशा दी जाए उन्होंने ऐसा सोचा और दोस्तों उन्होंने उस समय लिखा जिस समय यह लेखन शैली बिल्कुल भी नहीं लिखी जाती थी

भारत की आजादी में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा इन्होंने अपने लेखक शैली से बहुत सारी पुस्तकें लिखी और भारत के लोगों में एक ज्वाला उत्पन्न की ब्रिटिश सरकार ने भी इन्हें रोकने का बहुत प्रयास करा।

लेकिन दोस्तों कभी भी इनको इनके लेखक के लिए वह सम्मान नहीं मिलता है जो इन्हें मिलना चाहिए या जैसा हम रविंद्र नाथ टैगोर को देते हैं।

लेकिन दोस्तों हिंदी साहित्य की बात जहा आती हैं वहां इनका नाम सबसे ऊपर आता है परंतु दोस्तों जैसे कोई भी सम्मान जैसे रविंद्र नाथ टैगोर को कई पुरस्कार मिले हैं ऐसे कोई भी पुरस्कार मुंशी प्रेमचंद्र कौन नहीं मिला है भारतीय सरकार द्वारा और आज के समय तो हम इनको भूल ही गए हैं

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अंतिम शब्द

दोस्तों अंत में बस इतना ही कहा जा सकता हे की वह एक आशावादी साहित्यकार थे और समाज में बदलाव लाने के लिए उन्होंने अपनी बहुत सारी प्रयास करें और उन्होंने बहुत सारे लेख लिखें जिससे समाज में कई बदलाव आए और उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को आज भी लोग काफी पसंद करते हैं और उनको पढ़ते हैं

दोस्तों मैं आशा करता हूं आपको मेरा यह ब्लॉग पसंद आया होगा पसंद आया होगा तो मेरी वेबसाइट को फॉलो जरूर करना और इसलिए को अपने दोस्तों के साथ व्हाट्सएप फेसबुक इंस्टाग्राम पर शेयर जरूर करना ताकि उनको भी भारत के सबसे बड़े साहित्यकार कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद के बारे में जानकारी मिल सके।

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